Chapter 17 of 20

chapter 17

क्यूट कपल1,717 words~9 min read

     वो कॉलेज का आखरी दिन था। फेयरवेल पार्टी खत्म होने के बाद उन दोनों को मिलना था। नासिर ने हिना को सीधे पार्किंग लॉट में आने को बोला था। पर अफ़सोस वो पार्किंग एरिया में काफ़ी लेट पहुंची। उसके लेट होने की वजह सोहा का सेट किया हुआ ट्रैप था। हिना और सोहा दोनों बेस्टीज को नासिर पे क्रश था।अगर सोहा ने उनके बीच गलतफहमी न पैदा की होती तो शायद वो आज इस खूबसूरत रात में इन पगडंडियों पर एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलते।लेकिन वो एक दूसरे से खफा खफा और दूर दूर चल रहे थे।"तुम्हें कुछ कहना था" नासिर ने खामोशी तोड़ी और हिना के बराबर आके रुका।"तुम पार्किंग लॉट में क्यों नहीं आए" हिना ने धीरे धीरे कदम बढ़ाते उदास लहज़े में पूछा।"मैं आया था, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था लेकिन सोहा ने मुझे बताया कि तुम उसके भाई समीर के साथ जा चुकी हो" नासिर ने कहा और एकदम से रुका" क्या तुम पार्किंग लॉट में आई थी""सोहा ने कहा और तुमने मान लिया। क्या तुम सिर्फ उसके कहने पर वापिस चले गए?" उसके लहज़े में नाराज़गी थी।"क्या तुम पार्किंग एरिया में आई थी" नसीर ने दोबारा पूछा क्यों की थोड़ा बहुत नासिर को भी सोहा के नेचर का पता था।"हां आई थी मैंने आधी रात तक तुम्हारा इंतज़ार किया था।" उसकी बड़ी बड़ी आंखों में आसूं आ गए।"ऐसा नहीं है की सोहा के कहने पर मैं चला गया था" नासिर ने उसे गले लगा कर कहा " मॉम के लगातार फोन की वजह से मुझे जाना पड़ा।"ये वही रात थी जिसकी अगली सुबह समीरा अमेरिका से वापिस आने वाली थी। कुछ वक्त तक नासिर हिना को बेवफा समझता रहा। दानियाल के समझाने पर नासिर ने हिना से मिलकर बात करने का सोचा ही था की समीरा के साथ हुए हादसे ने नासिर की जिंदगी में सब कुछ तहस नहस कर दिया था। हिना को भी अरसे बाद समीरा के साथ हुए हादसे का इल्म हुआ था। वो तब से नासिर से मिलने के लिए बेचैन थी। फिर एक दिन दानियाल ने खुद उसे कॉन्टैक्ट किया माहीन के सीक्रेट ब्लड्टेस्ट के लिए और आज टीना के साथ उनके घर आना हो गया। नासिर का वहां मौजूद होना हिना के लिए महेज़ इत्तेफ़ाक था।      हिना और नासिर के बीच की तमाम गलतफमियां भी खत्म हो चुकी थीं लेकिन फिज़ा और उसकी दोस्तों की पार्टी अभी तक चल रही थी। वो सब अब अंदर हॉल में आकर हॉल गुल्ला मचा रही थी।     सुबह हो चुकी थी। घर में काफ़ी सन्नाटा था। दादी  अपने कमरे से बाहर आई तो देखा की फिज़ा और उसकी फ्रेंड्स हॉल में सोफे पर इधर उधर पड़ी सो रही थी। फ्रेश होकर वो किचन में आ गई। वहां शीबा पहले से ही कामों में मशरूफ थी।चेहरे पर पड़ती लगातार धूप ने डेजी को जगा दिया। वो आंख मलती दानियाल से मिलने उसके कमरे में आ गई।कमरे के मंजर ने उसे नींद से पूरी तरह बेदार  और  उसका दिल कांच की मानिंद चकना चूर कर दिया था।बिना शर्ट के दानियाल पेट के बल सो रहा था और उसके बाज़ू में  करवट लेटी माहीन। दोनों गहरी नींद में सो रहे थे। हालांकि दोनों को सुबह जल्दी उठने की आदत थी लेकिन आज सूरज भी उन्हें सवेरा होना का एहसास न दिला सका।उसने अपना टूटा दिल समेटा और गुस्से में तिलमिलाती दौड़ती हुई बाहर गार्डन में आ गई।वहां नासिर कॉलेज के लिए सुबह निकलती हिना को छोड़ने आया था। "व्हाट हैपन" उसने दौड़ती हुई डेजी को देख तो पूछा।"हे नासिर, डेनियल किस के सात सो रहा है"गुस्से में आंखें गोल गोल घूमती डेजी ने नासिर से पूछा"क्या.... क्या बकवास है" नासिर ने हैरत से कहा।"वही तो... में अपनी आईज से देख के आई" डेजी ने कहा।नासिर को शक हुआ कही भाई के साथ माहीन तो नहीं है।वो गिरता परता दानियाल के कमरे की तरफ भागा। उसने धीमी आवाज़ में दानियाल को जगाया " भाई, आप को शर्म नहीं आती ऐसी हरकत करते हुए " "तुम सुबह सुबह यहां क्या कर रहे हो" दानियाल ने नासिर को देखा और दोबारा आंख बन्द करके कहा।"भाई एक तो बिना कपड़ो के सोए हो उसपर से माहीन को भी सुला लिया" नासिर की आवाज़ कान में पड़ते ही दानियाल उछल कर बैठ गया।"ओह ये यहीं सो गई" उसने माहीन को देखा और मुस्कुराते हुए कहा।"भाई, मुस्कुराना बंद करें और माहीन को उठाएं" नासिर   झुंझला कर कहा। वो घबराया हुआ था की मामी ने देख लिया तो बवाल होजाएगा।"भाई मैं दरवाज़े पे हूं आप महीन को उठा दो" नासिर कहता हुआ कमरे से निकल गया। कमरे से बाहर एक और मुसीबत नासिर का इंतज़ार कर रही थी उसकी नज़र सामने से आती शीबा पर पड़ी। वो उल्टे पांव कमरे में घुस गया और बोला" भाई आपकी मॉम आ रही है""क्या" दानियाल उछल कर बेड से उतरा।दोनों को घबराहट से पसीने आने लगे। इतने में माहीन भी उठ बैठी। ये उनकी खुश किस्मती थी की दादी ने शीबा को  आवाज़ लगाई और वो वही से वापिस मुड़ गई।सबने सुकून की आह भरी।"फॉर योर काइंड इनफॉर्मेशन डेजी ने आप दोनो साथ में सोते हुए देखा है" नासिर दानियाल को टेंशन देकर चला गया।   शाम के वक्त दानियाल के घर के बरानदे में रिदा, रीमा, दादी और उनकी बहू शीबा बैठी थी। दानियाल - माहीन और दावर - फिज़ा की रिश्ते की बारे में चर्चा चल रही थी।फाइनली उन चारों का रिश्ता ऑफिशियल हो गया था। माहीन की मॉम रिदा, उनकी मंगनी कर वापिस अपनी बेटी के साथ अमेरिका जाना चाहती थी। दादी ने दानियाल और फिज़ा की मंगनी साथ ही कर देने का हुक्म सुना दिया।"नासिर, तुम ने अपना नंबर चेंज किया है क्या" हॉल  में बैठा दानियाल अपने फोन में नज़रे गड़ाए, उंगलियों से स्क्रीन को स्क्रोल करता हुआ बोला।"नहीं तो" नासिर ने लापरवाही से कहा। दानियाल के सामने सोफे पर लेटे नासिर ने अपने फोन पर जमी निगाहें  उसकी तरफ फेरी और लपक कर उसके बाज़ू में बैठते हुए बोला "भाई मेरा नंबर चार साल पुराना है और आपने अब तक सेव नहीं किया।" "नहीं यार, ऐसा नहीं है। मुझे कुछ दिनों से लगातार अननोन नंबर से ब्लैंक कॉल्स आ रहे हैं" दानियाल ने कहा। उसका ध्यान कहीं और था शायद वो कुछ सोच रहा था। "मैं आप को प्रैंक कॉल्स क्यों करूंगा" नासिर ने संजीदगी से कहा।जब से अमेरिका से लोग आए थे तब से दानियाल को ब्लैंक कॉल्स आ रहे थे। पहले दानियाल ने ध्यान नहीं दिया और फिर उसे नासिर का मज़ाक समझता रहा। अब तो नासिर ने भी संजीदगी से कह दिया था कि वो नहीं है।दानियाल ने इन ब्लैंक कॉल्स पर ध्यान देना शुरू किया ही था की उसकी और माहीन की मंगनी की खुशखबरी ने उसका ध्यान हटा दिया।दोनों घरों में मंगनी की तैयारियां बखूबी हो रही थी। बड़े खानदानों के चोंचले भी तो ज़्यादा होते हैं। दानियाल को ये सब चोंचले और फिजूल के खर्चे बिल्कुल पसंद नहीं थे। उसे तो बस इंतजार था उस लम्हे का की जब वो माहीन को अंगूठी पहना कर अपनी अमानत बना ले। लेकिन क्या करता वो अपने खानदान का बड़ा बेटा, भाई और पोता था  सबको अपनी ख्वाहिशें उसी की मंगनी में पूरी करनी थी।दादी की खुशी का तो ठिकाना ही न था उनकी ख्वाहिश जो पूरी होने को थी। बुढ़ापे में एक ही ख्वाहिश होती है की अपनी जिंदगी में अपने बच्चों का घर बस्ता देखना। वो दानियाल की नज़रें उतारते नहीं थक रही थी।"कैसा लग रहा हूं दादी" दानियाल ने अपने शेरवानी की आखरी बटन लगाके पूछा। "शहजादे लग रहे हो इन कपड़ों में" दादी एक बार और उसकी बलाए लेते हुए बोली।वो सीढ़ियों से नीचे उतरता हॉल का मुआयना कर रहा था। हॉल सलीके से सजा हुआ और मेहमानों से भरा था।ताज़े फूलों की खुशबू और मेहमानों की अलग अलग क्लोन फज़ाओ में बिखर कर माहोल को खुशगवार कर रही थी। काम में मशरूफ नासिर इधर उधर से आता जाता नज़र आ रहा था। " फिक्र न करो तुम्हारी मॉम माहीन और फिज़ा को ले आती होंगी" दानियाल को इधर उधर नज़रों दौड़ाता देख कर दादी ने उसके कान में सरगोशी की।दादी की सरगोशी पर वो अपनी हसीं दबाता हुआ तेज़ कदमों से दावर के बाज़ू में आकर खड़ा हो गया।दावर का भी दानियाल सा ही हाल था। दोनों अपनी अपनी होने वाली मंगेतर का बेसबरी से इंतज़ार करते खामोशी से खड़े थे।"दोनों हैंडसम लड़के भी आ गए इन लड़कियों को इतना टाइम क्यों लग रहा है" दानियाल की इकलौती फूफी ने अपने बाज़ू में खड़ी माहीन की मॉम रिदा से कहा। "लड़ियों को तो वक्त लगता ही है" रिदा मुस्कुराई।नासिर की मॉम आज सुबह ही कनाडा से डायरेक्ट अपने मायके आई थी। नासिर की बड़ी बहन शादी के बाद अपने शौहर के साथ कनाडा शिफ्ट हो गई थी। बस उसी से मिलने वो कनाडा गई हुई थी। जैसे ही उन्होंने दानियाल की मंगनी का सुना पहली फ्लाइट लेकर हिंदुस्तान चली आई।सारे खानदान के फर्द के साथ शिरकत किए हुए मेहमान, दानियाल और दावर, फोज और माहीन की राह तक रहे थे।"शीबा कब की गई है लेने अब तक नहीं आई" दादी ने कहा। उन्हें और सब्र नहीं हो रहा था।माहीन और फिज़ा, माहीन की तरफ तैयार हो रही थी। पार्लर वाली उन्हें तैयार कर रही थी। पार्टी के तमाम इंतजामात दानियाल की तरफ थे। "वो रही मामी जान। उन्हें क्या होगया" सूद बूद खोए, चेहरे पर खौफ की शिकन लिए, दौड़ती हुई हाल में दाखिल होती, शीबा को नासिर ने देखा तो कहा।वो दानियाल से चंद कदम के फासले पर रुकीं। चेहरे पे खौफ और बेयकीनी के मिले जुले आसार लिए बोली" माहीन और फिज़ा कमरे में नहीं हैं।  मैंने पूरे घर में देखा वो कहीं नहीं हैं। ज़मीन पर उनकी टूटी चूड़ियां बिखरी पड़ी हैं" उनकी आवाज़ भरराई और निढ़ाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ीं।शीबा के अल्फाज़ ने हॉल का माहोल ही बदल डाला। अपनी माहीन का इंतज़ार करती रिदा की तो दुनियां ही उजड़ गई थी।उनकी आंखों से आंसू जारी हो गए। वो सदमे से निढ़ाल, ज़मीन से जा लगी। दानियाल की फूफी ने उन्हें संभाला।माहीन के दीदार की हसरत लिए दानियाल की आंखो में खौफ के आंसू तैरने लगे। उसे अपना वजूद ठंडा पड़ता महसूस हो रहा था। लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ते दानियाल को नासिर ने थामा और उस खूबसूरत सोफे पर बैठाया जहां बैठ उसे माहीन की नाज़ुक उंगलियों में अपने नाम की अंगूठी सजानी थी।(आगे अगले पार्ट में)

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