Chapter 14 of 20

chapter 14

क्यूट कपल1,508 words~8 min read

                    नासिर के लैपटॉप तक पहुंचने से पहले दानियाल ने लैपटॉप उठा लिया।नोटिफिकेशन टोन ने दानियाल के कदम रोक लिए थे। वो वापिस कमरे में आया। उसे हिना के ईमेल का इंतज़ार था और शायद उसी का ईमेल था।"O भाई ,शायद आप का ईमेल आया है" नासिर कहता हुआ बेड से उठा और कमरे से बाहर निकल गया।     उसने ईमेल चेक किया और दादी से मिलने आ गाया।"जी दादी, आपने बुलाया।" दानियाल ने कहा।आराम कुर्सी पर बैठी दादी के पास ज़मीन पर बैठ गया ।"क्या तुमने माहीन को बताया" दादी कुछ देर खामोश रहने के बाद बोली।"क्या... क्या बताऊं" दानियाल को कुछ समझ न आया की दादी किस बारे में बात कर रही हैं।"मेरे सामने होशियार बनने की कोशिश न करो" दादी ने ज़रा तेज़ लहज़े में कहा।"नहीं, मैंने उससे ऑफिशियली कुछ भी नहीं कहा है" दानियाल ने शर्म और हैरत के मिले जुले लहज़े में कहा।"क्या, क्यों.... दानियाल मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी" वो हैरत और सवालिया नज़रों से उसे देखते हुए बोली।               दादी की बातों ने दानियाल को हैरतज़दा कर दिया और उसके ज़हेन में यही बात आई कि कहीं दादी को माहीन की प्रेगनेंसी का पता तो नहीं चल गया। दानियाल खामोश रहा।"क्या तुम माहीन की पसंद करते हो" दादी ने संजीदगी से पूछा।"जी बिलकुल दादी मैं उसे बहुत पसंद करता हूं"  दानियाल ने जल्दी से सफाई पेश की।"अगर तुम उसे पसंद करते हो तो तुम्हें उसके बाप से उसका हाथ मांगना चाहिए था।" दादी गुस्से से बोली।"अगर अफ़रोज़ को माहीन की प्रेगनेंसी का पता चला तो वो शर्म से मर जायेगा।" दादी ने कहा और उसकी तरफ झुकी और बोली" उसने उसे तुम्हारे भरोसे यहां भेजा था न।"  उनकी आंखे गुस्से से हाल हो रहे थी । दानियाल के पैरों तले से ज़मीन ही निकल गई थी। वो सर झुकाए उनकी बातें सुनता रहा। उसकी आंखों में पछतावे के आंसू थे।      "दानियाल खान ये हमारी तहज़ीब नहीं है, निकाह से पहले किसी नामहरम .....""वो प्रेगनेंट नहीं है" दानियाल ने उनकी तरफ देखते हुए  बात काटी।दरवाज़े के करीब से गुज़रती माहीन ने दानियाल की  बात सुन ली। "वो प्रेगनेंट नहीं है, मैंने टेस्ट कराया है" दानियाल ने अपनी बात दोहराई।अब दादी का गुस्सा ज़रा शांत हुआ और वो बोली " माहीन को बताओ की तुम उसे पसंद करते हो और उसकी राय जानो की वो तुम्हारे बारे में क्या सोचती है।"   कमरे से बाहर निकलते ही दानियाल ने वहां से जाती  माहीन को देखा और उसके पीछे दौड़ा " माहीन....माहीन, बात तो सुनो"वो नहीं रुकी और बाहर निकल गई।"क्या हुआ" दानियाल ने लपक कर उसका हाथ थामा।वो रुकी और हाथ झटक कर बोली" रिपोर्ट नेगेटिव है। तुमने मुझे क्यों नहीं बताया""मुझे अभी जस्ट पता चला" दानियाल ने कहा"दादी को कैसे पता इस बारे में" माहीन ने पूछा।"शायद उन्होंने ने हमारी बात सुनली होगी" दानियाल ने कहा।वो बात करते करते माहीन की तरफ आ गए थे। दोनों सोफे पे बैठ गए।"अगर रिपोर्ट पॉज़िटिव तो...." दानियाल कुछ देर सोचने के बाद खोए हुए अंदाज में बोला और रुक गया।"जो नहीं हुआ उस बारे में क्यों सोचना" माहीन ने उसकी तरफ पानी का ग्लास बढ़ते हुए कहा।दानियाल ने उसे देखा वो खुश और मुतमईन लग रही थी।अब वो भी चैन की सांस ले सकता था।   "क्या, आप ने उन्हें अपने दिल की बात अब तक नहीं बताई"नासिर ने हैरत से कहा।"धीरे बोल यार कोई सुन लेगा" दानियाल ने कहा"उफ! भाई मुझे आपको अपना भाई कहते हुए शर्म आ रही है" नासिर ने उसे छेड़ा।"हां, जैसे तुमने हिना को अपने दिल की बात बता ही दी हो" दानियाल ने उसके जले पी नमक उंडेल दिया।नासिर ने उसे घूरा।    लम्हा लम्हा गुज़रता गया। इस बीच दानियाल ने माहीन को अपने दिल की बात बताने की कई बार कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। उसे अंदाजा हो रहा था किसी को अपना दिल देना आसान है लेकिन इजहार -ए- इश्क इतना आसान नहीं होता।उसकी नाकामी पर नासिर और दावर दोनों उसका मज़ाक उड़ाते।    दावर को आए दो हफ्ते गुज़र गए थे। जैसे दानियाल  उसके बारे में अपनी राय कायम किए हुए था। उससे मिलने के बाद दानियाल को एहसास हुआ वो वैसा नहीं था।वो एक सीधा साधा लड़का था। जो निशा से वफा करने की कोशिश में कभी माहीन की मोहब्बत देख ही नहीं पाया था।नासिर और दावर की अच्छी दोस्ती हो गई थी। दोनों सताए हुए थे। दावर को धोका मिला था और नासिर कभी अपनी मोहब्बत को बता ही न सका की वो उससे मोहब्बत करता है।सुल्तान, लिसा को मिले और माहीन को हिंदुस्तान आए तीन महीने हो चेक थे। उनके घर में बिल्लियों की गिनती भी बढ़ गई थी। फिज़ा और माहीन, सुल्तान और लिसा के बच्चों के साथ खुद भी बच्ची बन जाती थी।  दानियाल ने कई बार दावर और फिज़ा को साथ खड़े बातें करते देखा था। शायद वो दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। दानियाल को उनके रिश्ते से कोई दिक्कत न  थी। लेकिन वो डरता था माहीन क्या सोचेगी।            उसे जिस बात का अंदेशा था वो ही हुआ आखिर दावर ने दानियाल से उसकी बहन फिज़ा के रिश्ते की बात कर दी।दानियाल फिज़ा और माहीन के रिश्ते को खराब नहीं करना चाहता था। वो उस वक्त खामोश रहा और कुछ वक्त की इल्तेजा की।"जहांपनाह ने आपको अंदर जाने से मना किया है" नासिर ने दानियाल को दादी के कमरे में जाने से रोका।"क्यों, मिस्टर गेटकीपर" दानियाल ने पूछा।"जब तक आप अपने दिल की खुराफात उनकी होने वाली बहू को नहीं बताते वो आपसे तब तक नहीं मिलेंगी" नासिर ने शाही दरबान के अंदाज में कहा।"उफ! ये क्या बचपना है। क्या वो ठीक है" दानियाल ने परेशान होकर पूछा।"हां भाई, ठीक हैं।सर में दर्द थी मैंने दवा देदी।" कमरे से बाहर आती फिज़ा ने कहा।"आप को दादी की बात मान लेनी चाहिए" फिज़ा कहती हुई चली गई।"सबको आप की लवस्टोरी में कितनी दिलचस्पी है, भाई" नासिर ने उसे फिर छेड़ा।"मैं हिना से मिला था" दानियाल ने उसे घूरते हुए कहा और वहां से चल पड़ा।"क्या, सच में। कहां ..?? भाई प्लीज़ बताएं" नासिर उसके पीछे पीछे दौड़ा।दानियाल अपने कमरे में दाखिल हुआ, उसने अपने पीछे आते नासिर को मुड़ कर देखा, अपने कंधे उचकाए और दरवाज़ा बंद कर लिया।"भाई , प्लीज़ ऐसा न करें मेरे साथ" नासिर ने इल्तेजा की।दानियाल बखूबी जानता था कि कॉलेज के बाद नासिर ने हिना को कितना मिस किया था और आज भी करता है। इसलिए उसने नासिर को ज़्यादा परेशान नहीं किया और दरवाज़ा खोल दिया।"इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा" दानियाल ने कहा।"भाई, आप मज़ाक तो नहीं कर रहे" नासिर सहमा हुआ था।"नहीं, यार मज़ाक नहीं कर रहा।" दानियाल ने उसे गले लगाया और कहा।"चल वादा रहा ,तुम दोनों की मीटिंग मैं अरेंज करता हूं" दानियाल ने कहा।"थैंक्यू भाई, आप बस हुक्म कीजिए " नासिर ने कहा और अपने कमरे की तरफ चला गया।   दानियाल के हुक्म के मुताबिक नासिर ने सब के साथ बाहर डिनर का प्लान बना लिया। उसने किसी को पर्सनली नहीं कहा था। सबको टेक्स्ट कर डिनर के लिए इनवाइट किया था। सब अलग अलग  पहुंचे। दानियाल और माहीन के बिना ही सबने डिनर एंजॉय किया।      आज आखिर वो रात आ ही गई थी कि जब दानियाल ने अपने दिल की बात माहीन को बता देने की हिम्मत जुटाई।दानियाल ने डिनर बनाय और घर की टैरिस को ताज़े फूलों और खुशबूदार रंगीन मोमबत्तियों से सजाया था।  दोनों ने उस खूबसूरत और पुरसुकून माहोल में डिनर किया। इस लम्हे का इंतज़ार तो माहीन को भी कब से था।                 खाने के बाद वो रेलिंग के पास आ खड़े हुए। तेज़ हवाएं माहीन के खुले बालों को बार बार उसकी गर्दन से हटा रही थी। "आज मौसम बहुत खूबसूरत है न" माहीन ने दानियाल की तरफ देखा और कहा।"हां, तुम्हारी तरह" दानियाल ने कहा।"आज कुछ स्पेशल है"  माहीन ने सजावटों की तरफ इशारा करके पूछा।"हा बहुत स्पेशल" दानियाल ने कहा।"वो क्या" माहीन ने दानियाल के ज़रा करीब आकर कहा।"मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं" दानियाल ने उसके चेहरे पर गर्दिश करते बालों को अपने उंगलियों से हटाया।"मैं सुन रही हूं" महीन ने नर्म और धीरे लहज़े में कहा। उसकी उंगलियों की हल्की सी छुअन ने महीन का लहज़ा बदल दिया था।"माहीन ,I think......" दानियाल ने कहा।"Ya, I think......"माहीन ने उसकी बात दोहराई। वो सुनने को बेकरार थी।"I think, I can't say" दानियाल ने कहा।"What" माहीन ने अपने गुस्से को काबू करते हुए कहा।"आह! ये इतना मुश्किल क्यों है" दानियाल ने अपनी पेशानी को उंगलियों से सिकोड़ते हुए कहा।"दानियाल खान, रहने दो। ये तुमसे नहीं होगा। मैं जा रही हूं" माहीन ने कहा और जाने के लिए मुड़ी।     उसकी नाज़ुक कलाई पर दानियाल के मज़बूत हाथों की हल्की गिरफ्त ने माहीन के बढ़ते कदम रोक लिए।दानियाल ने उसे अपनी तरफ ऐसे खींचा कि माहीन की पीठ उसके सीने से जा टकराई....(आगे अगले पार्ट में)

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